॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 6.14.13
न तस्य संपदः सर्वा महिष्यो वामलोचनाः।
सार्वभौमस्य भूश्चेयमभवन् प्रीतिहेतवः॥ १३
na tasya saṃpadaḥ sarvā mahiṣyo vāmalocanāḥ|
sārvabhaumasya bhūśceyamabhavan prītihetavaḥ|| 13
अर्थ
वे सारी पृथ्वीके एकछत्र सम्राट् थे, बहुत-सी सुन्दरी रानियाँ थीं तथा सारी पृथ्वी उनके वशमें थी। सब प्रकारकी सम्पत्तियाँ उनकी सेवामें उपस्थित थीं, परन्तु वे सब वस्तुएँ उन्हें सुखी न कर सकीं॥ १३॥