हम देखते हैं कि प्रायः शुद्ध सत्त्वमय देवता और पवित्रहृदय ऋषि भी भगवान्की परम प्रेममयी अनन्य भक्तिसे वंचित ही रह जाते हैं। सचमुच भगवान्की भक्ति बड़ी दुर्लभ है॥ २॥✎ 538539
देवानां शुद्धसत्त्वानामृषीणां चामलात्मनाम्।
भक्तिर्मुकुन्दचरणे न प्रायेणोपजायते॥ २
हम देखते हैं कि प्रायः शुद्ध सत्त्वमय देवता और पवित्रहृदय ऋषि भी भगवान्की परम प्रेममयी अनन्य भक्तिसे वंचित ही रह जाते हैं। सचमुच भगवान्की भक्ति बड़ी दुर्लभ है॥ २॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 6.14.2 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 768) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/6/14/2/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)