श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.14.2

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 14 · अथ चतुर्दशोऽध्यायः

देवानां शुद्धसत्त्वानामृषीणां चामलात्मनाम्।

भक्तिर्मुकुन्दचरणे न प्रायेणोपजायते॥ २

devānāṃ śuddhasattvānāmṛṣīṇāṃ cāmalātmanām|

bhaktirmukundacaraṇe na prāyeṇopajāyate|| 2

अर्थ

हम देखते हैं कि प्रायः शुद्ध सत्त्वमय देवता और पवित्रहृदय ऋषि भी भगवान्‌की परम प्रेममयी अनन्य भक्तिसे वंचित ही रह जाते हैं। सचमुच भगवान्‌की भक्ति बड़ी दुर्लभ है॥ २॥✎ 538 539

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #538 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #539 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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