भगवन्! इस जगत्के प्राणी पृथ्वीके धूलिकणोंके समान ही असंख्य हैं। उनमेंसे कुछ मनुष्य आदि श्रेष्ठ जीव ही अपने कल्याणकी चेष्टा करते हैं॥ ३॥✎ 538539
रजोभिः समसंख्याताः पार्थिवैरिह जन्तवः।
तेषां ये केचनेहन्ते श्रेयो वै मनुजादयः॥ ३
भगवन्! इस जगत्के प्राणी पृथ्वीके धूलिकणोंके समान ही असंख्य हैं। उनमेंसे कुछ मनुष्य आदि श्रेष्ठ जीव ही अपने कल्याणकी चेष्टा करते हैं॥ ३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 6.14.3 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 768) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/6/14/3/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)