ब्रह्मन्! उनमें भी संसारसे मुक्ति चाहनेवाले तो बिरले ही होते हैं और मोक्ष चाहनेवाले हजारोंमें मुक्ति या सिद्धि लाभ तो कोई-सा ही कर पाता है॥ ४॥✎ 538539
प्रायो मुमुक्षवस्तेषां केचनैव द्विजोत्तम।
मुमुक्षूणां सहस्रेषु कश्चिन्मुच्येत सिध्यति॥ ४
ब्रह्मन्! उनमें भी संसारसे मुक्ति चाहनेवाले तो बिरले ही होते हैं और मोक्ष चाहनेवाले हजारोंमें मुक्ति या सिद्धि लाभ तो कोई-सा ही कर पाता है॥ ४॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 6.14.4 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 768) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/6/14/4/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)