श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.14.5

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 14 · अथ चतुर्दशोऽध्यायः

मुक्तानामपि सिद्धानां नारायणपरायणः।

सुदुर्लभः प्रशान्तात्मा कोटिष्वपि महामुने॥ ५

muktānāmapi siddhānāṃ nārāyaṇaparāyaṇaḥ|

sudurlabhaḥ praśāntātmā koṭiṣvapi mahāmune|| 5

अर्थ

महामुने! करोड़ों सिद्ध एवं मुक्त पुरुषोंमें भी वैसे शान्तचित्त महापुरुषका मिलना तो बहुत ही कठिन है, जो एकमात्र भगवान्‌के ही परायण हो॥ ५॥✎ 538 539

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #538 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #539 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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