सम्राट् चित्रकेतुके आनन्दका तो कहना ही क्या था। वे स्नान करके पवित्र हुए। फिर उन्होंने वस्त्राभूषणोंसे सुसज्जित हो, ब्राह्मणोंसे स्वस्तिवाचन कराकर और आशीर्वाद लेकर पुत्रका जातकर्म-संस्कार करवाया॥ ३३॥
हृष्टो राजा कुमारस्य स्नातः शुचिरलङ्कृतः।
वाचयित्वाऽऽशिषो विप्रैः कारयामास जातकम्॥ ३३
सम्राट् चित्रकेतुके आनन्दका तो कहना ही क्या था। वे स्नान करके पवित्र हुए। फिर उन्होंने वस्त्राभूषणोंसे सुसज्जित हो, ब्राह्मणोंसे स्वस्तिवाचन कराकर और आशीर्वाद लेकर पुत्रका जातकर्म-संस्कार करवाया॥ ३३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 6.14.33 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 771) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/6/14/33/