श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.14.35

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 14 · अथ चतुर्दशोऽध्यायः

ववर्ष काममन्येषां पर्जन्य इव देहिनाम्।

धन्यं यशस्यमायुष्यं कुमारस्य महामनाः॥ ३५

vavarṣa kāmamanyeṣāṃ parjanya iva dehinām|

dhanyaṃ yaśasyamāyuṣyaṃ kumārasya mahāmanāḥ|| 35

अर्थ

उदारशिरोमणि राजा चित्रकेतुने पुत्रके धन, यश और आयुकी वृद्धिके लिये दूसरे लोगोंको भी मुँहमाँगी वस्तुएँ दीं—ठीक उसी प्रकार जैसे मेघ सभी जीवोंका मनोरथ पूर्ण करता है॥ ३५॥

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