॥ श्रीहरिः ॥
चित्रकेतोरतिप्रीतिर्यथा दारे प्रजावति।
न तथान्येषु सञ्जज्ञे बालं लालयतोऽन्वहम्॥ ३८
citraketoratiprītiryathā dāre prajāvati|
na tathānyeṣu sañjajñe bālaṃ lālayato'nvaham|| 38
अर्थ
प्रतिदिन बालकका लाड़-प्यार करते रहनेके कारण सम्राट् चित्रकेतुका जितना प्रेम बच्चेकी माँ कृतद्युतिमें था, उतना दूसरी रानियोंमें न रहा॥ ३८॥
चित्रकेतोरतिप्रीतिर्यथा दारे प्रजावति।
न तथान्येषु सञ्जज्ञे बालं लालयतोऽन्वहम्॥ ३८
प्रतिदिन बालकका लाड़-प्यार करते रहनेके कारण सम्राट् चित्रकेतुका जितना प्रेम बच्चेकी माँ कृतद्युतिमें था, उतना दूसरी रानियोंमें न रहा॥ ३८॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 6.14.38 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 772) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/6/14/38/