महारानी कृतद्युतिको सौतोंकी इस घोर पापमयी करतूतका कुछ भी पता न था। उन्होंने दूरसे देखकर समझ लिया कि बच्चा सो रहा है। इसलिये वे महलमें इधर-उधर डोलती रहीं॥ ४४॥✎ 540
कृतद्युतिरजानन्ती सपत्नीनामघं महत्।
सुप्त एवेति सञ्चिन्त्य निरीक्ष्य व्यचरद् गृहे॥ ४४
महारानी कृतद्युतिको सौतोंकी इस घोर पापमयी करतूतका कुछ भी पता न था। उन्होंने दूरसे देखकर समझ लिया कि बच्चा सो रहा है। इसलिये वे महलमें इधर-उधर डोलती रहीं॥ ४४॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 6.14.44 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 772) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/6/14/44/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)