श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.15.20

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 15 · अथ पञ्चदशोऽध्यायः

तदैव१ ते परं ज्ञानं ददामि गृहमागतः।

ज्ञात्वान्याभिनिवेशं२ ते पुत्रमेव ददावहम्॥ २०

tadaiva te paraṃ jñānaṃ dadāmi gṛhamāgataḥ|

jñātvānyābhiniveśaṃ te putrameva dadāvaham|| 20

अर्थ

जिस समय पहले-पहल मैं तुम्हारे घर आया था, उसी समय मैं तुम्हें परम ज्ञानका उपदेश देता; परन्तु मैंने देखा कि अभी तो तुम्हारे हृदयमें पुत्रकी उत्कट लालसा है, इसलिये उस समय तुम्हें ज्ञान न देकर मैंने पुत्र ही दिया॥ २०॥✎ 1985

टिप्पणियाँ

  1. १

    प्रा० पा०—तत्रैव।

    (मुद्रित पृष्ठ 777)
  2. २

    प्रा० पा०—ज्ञात्वात्माभि०।

    (मुद्रित पृष्ठ 777)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1985 मुद्रणकी अपनी भूल (गीताप्रेसके पुराने संस्करणों और ग्रन्थकी अपनी गणनासे): जीवात्माका → जीवात्माकी

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