॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 6.15.21
अधुना पुत्रिणां तापो भवतैवानुभूयते।
एवं दारा गृहा रायो३ विविधैश्वर्यसम्पदः॥ २१
adhunā putriṇāṃ tāpo bhavataivānubhūyate|
evaṃ dārā gṛhā rāyo vividhaiśvaryasampadaḥ|| 21
अर्थ
अब तुम स्वयं अनुभव कर रहे हो कि पुत्रवानोंको कितना दुःख होता है। यही बात स्त्री, घर, धन, विविध प्रकारके ऐश्वर्य, सम्पत्तियाँ, शब्द-रूप-रस आदि विषय, राज्यवैभव, पृथ्वी, राज्य, सेना, खजाना, सेवक, अमात्य, सगे-सम्बन्धी, इष्ट-मित्र सबके लिये हैं; क्योंकि ये सब-के-सब अनित्य हैं॥ २१-२२॥✎ 1985
टिप्पणियाँ
- ३
प्रा० पा०—रामा।