श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.15.8

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 15 · अथ पञ्चदशोऽध्यायः

देहदेहिविभागोऽयमविवेककृतः पुरा।

जातिव्यक्तिविभागोऽयं यथा वस्तुनि कल्पितः॥ ८

dehadehivibhāgo'yamavivekakṛtaḥ purā|

jātivyaktivibhāgo'yaṃ yathā vastuni kalpitaḥ|| 8

अर्थ

राजन्! जैसे एक ही मृत्तिकारूप वस्तुमें घटत्व आदि जाति और घट आदि व्यक्तियोंका विभाग केवल कल्पनामात्र है, उसी प्रकार यह देही और देहका विभाग भी अनादि एवं अविद्या-कल्पित है*॥ ८॥

टिप्पणियाँ

  1. *

    अनित्य होनेके कारण शरीर असत्य है और शरीर असत्य होनेके कारण उनके भिन्‍न-भिन्‍न अभिमानी भी असत्य ही हैं। त्रिकालाबाधित सत्य तो एकमात्र परमात्मा ही हैं। अतः शोक करना किसी प्रकार भी उचित नहीं है।

    (मुद्रित पृष्ठ 776)

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