श्रीशुकदेवजी कहते हैं—राजन्! जब महर्षि अंगिरा और देवर्षि नारदने इस प्रकार राजा चित्रकेतुको समझाया-बुझाया, तब उन्होंने कुछ धीरज धारण करके शोकसे मुरझाये हुए मुखको हाथसे पोंछा और उनसे कहा—॥ ९॥
एवमाश्वासितो राजा चित्रकेतुर्द्विजोक्तिभिः।
प्रमृज्य पाणिना वक्त्रमाधिम्लानमभाषत॥ ९
श्रीशुकदेवजी कहते हैं—राजन्! जब महर्षि अंगिरा और देवर्षि नारदने इस प्रकार राजा चित्रकेतुको समझाया-बुझाया, तब उन्होंने कुछ धीरज धारण करके शोकसे मुरझाये हुए मुखको हाथसे पोंछा और उनसे कहा—॥ ९॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 6.15.9 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 776) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/6/15/9/