भगवान् नारदने देखा कि चित्रकेतु जितेन्द्रिय, भगवद्भक्त और शरणागत हैं। अतः उन्होंने बहुत प्रसन्न होकर उन्हें इस विद्याका उपदेश किया॥ १७॥
अथ तस्मै प्रपन्नाय भक्ताय प्रयतात्मने।
भगवान्नारदः प्रीतो विद्यामेतामुवाच ह॥ १७
भगवान् नारदने देखा कि चित्रकेतु जितेन्द्रिय, भगवद्भक्त और शरणागत हैं। अतः उन्होंने बहुत प्रसन्न होकर उन्हें इस विद्याका उपदेश किया॥ १७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 6.16.17 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 780) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/6/16/17/