॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 6.16.18
ॐ नमस्तुभ्यं भगवते वासुदेवाय धीमहि।
प्रद्युम्नायानिरुद्धाय नमः सङ्कर्षणाय च॥ १८
oṃ namastubhyaṃ bhagavate vāsudevāya dhīmahi|
pradyumnāyāniruddhāya namaḥ saṅkarṣaṇāya ca|| 18
अर्थ
(देवर्षि नारदने यों उपदेश किया—) ‘ॐकारस्वरूप भगवन्! आप वासुदेव, प्रद्युम्न, अनिरुद्ध और संकर्षणके रूपमें क्रमशः चित्त, बुद्धि, मन और अहंकारके अधिष्ठाता हैं। मैं आपके इस चतुर्व्यूहरूपका बार-बार नमस्कारपूर्वक ध्यान करता हूँ॥ १८॥