॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 6.16.41
विषममतिर्न यत्र नृणां
त्वमहमिति मम तवेति च यदन्यत्र।
विषमधिया रचितो यः
स ह्यविशुद्धः क्षयिष्णुरधर्मबहुलः॥ ४१
viṣamamatirna yatra nṛṇāṃ
tvamahamiti mama taveti ca yadanyatra|
viṣamadhiyā racito yaḥ
sa hyaviśuddhaḥ kṣayiṣṇuradharmabahulaḥ|| 41
अर्थ
वह भागवतधर्म इतना शुद्ध है कि उसमें सकाम धर्मोंके समान मनुष्योंकी वह विषमबुद्धि नहीं होती कि ‘यह मैं हूँ, यह मेरा है, यह तू है और यह तेरा है।’ इसके विपरीत जिस धर्मके मूलमें ही विषमताका बीज बो दिया जाता है, वह तो अशुद्ध, नाशवान् और अधर्मबहुल होता है॥ ४१॥