श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.16.42

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 16 · अथ षोडशोऽध्यायः

कः क्षेमो निजपरयोः

कियानर्थः स्वपरद्रुहा धर्मेण।

स्वद्रोहात् तव कोपः

परसम्पीडया च तथाधर्मः॥ ४२

kaḥ kṣemo nijaparayoḥ

kiyānarthaḥ svaparadruhā dharmeṇa|

svadrohāt tava kopaḥ

parasampīḍayā ca tathādharmaḥ|| 42

अर्थ

सकाम धर्म अपना और दूसरेका भी अहित करनेवाला है। उससे अपना या पराया—किसीका कोई भी प्रयोजन और हित सिद्ध नहीं होता। प्रत्युत सकाम धर्मसे जब अनुष्ठान करनेवालेका चित्त दुखता है, तब आप रुष्ट होते हैं और जब दूसरेका चित्त दुखता है, तब वह धर्म नहीं रहता—अधर्म हो जाता है॥ ४२॥✎ 543

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #543 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् को → भगवान्‌को

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