श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.16.43

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 16 · अथ षोडशोऽध्यायः

न व्यभिचरति तवेक्षा

यया ह्यभिहितो भागवतो धर्मः।

स्थिरचरसत्त्वकदम्बे-

ष्वपृथग्धियो यमुपासते त्वार्याः॥ ४३

na vyabhicarati tavekṣā

yayā hyabhihito bhāgavato dharmaḥ|

sthiracarasattvakadambe-

ṣvapṛthagdhiyo yamupāsate tvāryāḥ|| 43

अर्थ

भगवन्! आपने जिस दृष्टिसे भागवतधर्मका निरूपण किया है, वह कभी परमार्थसे विचलित नहीं होती। इसलिये जो संत पुरुष चर-अचर समस्त प्राणियोंमें समदृष्टि रखते हैं, वे ही उसका सेवन करते हैं॥ ४३॥✎ 543

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #543 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् को → भगवान्‌को

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