श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.16.44

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 16 · अथ षोडशोऽध्यायः

न हि भगवन्‍नघटितमिदं

त्व१द्दर्शनान्‍नृणामखिलपापक्षयः ।✎ 1094

यन्‍नामसकृच्छ्रवणात्

पुल्कसकोऽपि विमुच्यते संसारात्॥ ४४

na hi bhagavannaghaṭitamidaṃ

tvaddarśanānnṛṇāmakhilapāpakṣayaḥ |

yannāmasakṛcchravaṇāt

pulkasako'pi vimucyate saṃsārāt|| 44

अर्थ

भगवन्! आपके दर्शनमात्रसे ही मनुष्योंके सारे पाप क्षीण हो जाते हैं, यह कोई असम्भव बात नहीं है; क्योंकि आपका नाम एक बार सुननेसे ही नीच चाण्डाल भी संसारसे मुक्त हो जाता है॥ ४४॥✎ 543

टिप्पणियाँ

  1. १

    प्रा० पा०—त्वद्दर्शिनानृ०।

    (मुद्रित पृष्ठ 784)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #543 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् को → भगवान्‌को
  • #1094 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): त्व्र → त्व

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