श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! जब विद्याधरोंके अधिपति चित्रकेतुने अनन्तभगवान्की इस प्रकार स्तुति की, तब उन्होंने प्रसन्न होकर उनसे कहा॥ ४९॥✎ 544
संस्तुतो भगवानेवमनन्तस्तमभाषत।
विद्याधरपतिं प्रीतश्चित्रकेतुं कुरूद्वह॥ ४९
श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! जब विद्याधरोंके अधिपति चित्रकेतुने अनन्तभगवान्की इस प्रकार स्तुति की, तब उन्होंने प्रसन्न होकर उनसे कहा॥ ४९॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 6.16.49 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 785) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/6/16/49/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
#544 शब्दोंके बीचका स्थान: अनन्तभगवान् की → अनन्तभगवान्की