श्रीभगवान्ने कहा—चित्रकेतो! देवर्षि नारद और महर्षि अंगिराने तुम्हें मेरे सम्बन्धमें जिस विद्याका उपदेश दिया है, उससे और मेरे दर्शनसे तुम भलीभाँति सिद्ध हो चुके हो ॥ ५०॥✎ 545
यन्नारदाङ्गिरोभ्यां ते व्याहृतं मेऽनुशासनम्।
संसिद्धोऽसि तया राजन् विद्यया दर्शनाच्च मे॥ ५०
श्रीभगवान्ने कहा—चित्रकेतो! देवर्षि नारद और महर्षि अंगिराने तुम्हें मेरे सम्बन्धमें जिस विद्याका उपदेश दिया है, उससे और मेरे दर्शनसे तुम भलीभाँति सिद्ध हो चुके हो ॥ ५०॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 6.16.50 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 785) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/6/16/50/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
#545 शब्दोंके बीचका स्थान: श्रीभगवान् ने → श्रीभगवान्ने
#1095 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): यन्नारदांङ्गिरोभ्यां → यन्नारदाङ्गिरोभ्यां