श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.16.54

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 16 · अथ षोडशोऽध्यायः

एवं जागरणादीनि जीवस्थानानि चात्मनः।

मायामात्राणि विज्ञाय तद्द्रष्टारं परं स्मरेत्॥ ५४

evaṃ jāgaraṇādīni jīvasthānāni cātmanaḥ|

māyāmātrāṇi vijñāya taddraṣṭāraṃ paraṃ smaret|| 54

अर्थ

जैसे स्वप्नमें सोया हुआ पुरुष स्वप्नान्तर होनेपर सम्पूर्ण जगत‍्को अपनेमें ही देखता है और स्वप्नान्तर टूट जानेपर स्वप्नमें ही जागता है तथा अपनेको संसारके एक कोनेमें स्थित देखता है, परन्तु वास्तवमें वह भी स्वप्न ही है, वैसे ही जीवकी जाग्रत् आदि अवस्थाएँ परमेश्‍वरकी ही माया हैं—यों जानकर सबके साक्षी मायातीत परमात्माका ही स्मरण करना चाहिये॥ ५३-५४॥✎ 545

यह अर्थ श्लोक 53–54 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #545 शब्दोंके बीचका स्थान: श्रीभगवान् ने → श्रीभगवान्‌ने

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