sukhaṃ ca nirguṇaṃ brahma tamātmānamavehi mām|| 55
अर्थ
सोया हुआ पुरुष जिसकी सहायतासे अपनी निद्रा और उसके अतीन्द्रिय सुखका अनुभव करता है, वह ब्रह्म मैं ही हूँ; उसे तुम अपनी आत्मा समझो॥ ५५॥✎ 545
येन प्रसुप्तः पुरुषः स्वापं वेदात्मनस्तदा।
सुखं च निर्गुणं ब्रह्म तमात्मानमवेहि माम्॥ ५५
सोया हुआ पुरुष जिसकी सहायतासे अपनी निद्रा और उसके अतीन्द्रिय सुखका अनुभव करता है, वह ब्रह्म मैं ही हूँ; उसे तुम अपनी आत्मा समझो॥ ५५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 6.16.55 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 785) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/6/16/55/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
#545 शब्दोंके बीचका स्थान: श्रीभगवान् ने → श्रीभगवान्ने