श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.16.55

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 16 · अथ षोडशोऽध्यायः

येन प्रसुप्तः पुरुषः स्वापं वेदात्मनस्तदा।

सुखं च निर्गुणं ब्रह्म तमात्मानमवेहि माम्॥ ५५

yena prasuptaḥ puruṣaḥ svāpaṃ vedātmanastadā|

sukhaṃ ca nirguṇaṃ brahma tamātmānamavehi mām|| 55

अर्थ

सोया हुआ पुरुष जिसकी सहायतासे अपनी निद्रा और उसके अतीन्द्रिय सुखका अनुभव करता है, वह ब्रह्म मैं ही हूँ; उसे तुम अपनी आत्मा समझो॥ ५५॥✎ 545

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #545 शब्दोंके बीचका स्थान: श्रीभगवान् ने → श्रीभगवान्‌ने

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