श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.16.56

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 16 · अथ षोडशोऽध्यायः

उभयं स्मरतः पुंसः प्रस्वापप्रतिबोधयोः।

अन्वेति व्यतिरिच्येत तज्ज्ञानं ब्रह्म तत् परम्॥ ५६

ubhayaṃ smarataḥ puṃsaḥ prasvāpapratibodhayoḥ|

anveti vyatiricyeta tajjñānaṃ brahma tat param|| 56

अर्थ

पुरुष निद्रा और जागृति—इन दोनों अवस्थाओंका अनुभव करनेवाला है। वह उन अवस्थाओंमें अनुगत होनेपर भी वास्तवमें उनसे पृथक् है। वह सब अवस्थाओंमें रहनेवाला अखण्ड एकरस ज्ञान ही ब्रह्म है, वही परब्रह्म है॥ ५६॥✎ 545

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #545 शब्दोंके बीचका स्थान: श्रीभगवान् ने → श्रीभगवान्‌ने

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