anveti vyatiricyeta tajjñānaṃ brahma tat param|| 56
अर्थ
पुरुष निद्रा और जागृति—इन दोनों अवस्थाओंका अनुभव करनेवाला है। वह उन अवस्थाओंमें अनुगत होनेपर भी वास्तवमें उनसे पृथक् है। वह सब अवस्थाओंमें रहनेवाला अखण्ड एकरस ज्ञान ही ब्रह्म है, वही परब्रह्म है॥ ५६॥✎ 545
उभयं स्मरतः पुंसः प्रस्वापप्रतिबोधयोः।
अन्वेति व्यतिरिच्येत तज्ज्ञानं ब्रह्म तत् परम्॥ ५६
पुरुष निद्रा और जागृति—इन दोनों अवस्थाओंका अनुभव करनेवाला है। वह उन अवस्थाओंमें अनुगत होनेपर भी वास्तवमें उनसे पृथक् है। वह सब अवस्थाओंमें रहनेवाला अखण्ड एकरस ज्ञान ही ब्रह्म है, वही परब्रह्म है॥ ५६॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 6.16.56 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 785) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/6/16/56/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
#545 शब्दोंके बीचका स्थान: श्रीभगवान् ने → श्रीभगवान्ने