श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.17.13

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 17 · अथ सप्तदशोऽध्यायः

एषामनुध्येयपदाब्जयुग्मं

जगद‍्गुरुं मङ्गलमङ्गलं स्वयम्।

यः क्षत्रबन्धुः परिभूय सूरीन्

प्रशास्ति धृष्टस्तदयं हि दण्ड्यः॥ १३

eṣāmanudhyeyapadābjayugmaṃ

jagadguruṃ maṅgalamaṅgalaṃ svayam|

yaḥ kṣatrabandhuḥ paribhūya sūrīn

praśāsti dhṛṣṭastadayaṃ hi daṇḍyaḥ|| 13

अर्थ

ब्रह्मा आदि समस्त महापुरुष जिनके चरणकमलोंका ध्यान करते रहते हैं, उन्हीं मंगलोंको मंगल बनानेवाले साक्षात् जगद‍्गुरु भगवान्का और उनके अनुयायी महात्माओंका इस अधम क्षत्रियने तिरस्कार किया है और शासन करनेकी चेष्टा की है। इसलिये यह ढीठ सर्वथा दण्डका पात्र है॥ १३॥

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