इसे अपने बड़प्पनका घमण्ड है। यह मूर्ख भगवान् श्रीहरिके उन चरणकमलोंमें रहनेयोग्य नहीं है, जिनकी उपासना बड़े-बड़े सत्पुरुष किया करते हैं॥ १४॥
नायमर्हति वैकुण्ठपादमूलोपसर्पणम्।
सम्भावितमतिः स्तब्धः साधुभिः पर्युपासितम्॥ १४
इसे अपने बड़प्पनका घमण्ड है। यह मूर्ख भगवान् श्रीहरिके उन चरणकमलोंमें रहनेयोग्य नहीं है, जिनकी उपासना बड़े-बड़े सत्पुरुष किया करते हैं॥ १४॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 6.17.14 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 788) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/6/17/14/