श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.17.22

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 17 · अथ सप्तदशोऽध्यायः

न तस्य कश्चिद्दयितः प्रतीपो

न ज्ञातिबन्धुर्न परो न च स्वः।

समस्य सर्वत्र निरञ्जनस्य

सुखे न रागः कुत एव रोषः॥ २२

na tasya kaściddayitaḥ pratīpo

na jñātibandhurna paro na ca svaḥ|

samasya sarvatra nirañjanasya

sukhe na rāgaḥ kuta eva roṣaḥ|| 22

अर्थ

माताजी! भगवान् श्रीहरि सबमें सम और माया आदि मलसे रहित हैं। उनका कोई प्रिय-अप्रिय, जाति-बन्धु, अपना-पराया नहीं है। जब उनका सुखमें राग ही नहीं है, तब उनमें रागजन्य क्रोध तो हो ही कैसे सकता है॥ २२॥

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