॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 6.17.22
न तस्य कश्चिद्दयितः प्रतीपो
न ज्ञातिबन्धुर्न परो न च स्वः।
समस्य सर्वत्र निरञ्जनस्य
सुखे न रागः कुत एव रोषः॥ २२
na tasya kaściddayitaḥ pratīpo
na jñātibandhurna paro na ca svaḥ|
samasya sarvatra nirañjanasya
sukhe na rāgaḥ kuta eva roṣaḥ|| 22
अर्थ
माताजी! भगवान् श्रीहरि सबमें सम और माया आदि मलसे रहित हैं। उनका कोई प्रिय-अप्रिय, जाति-बन्धु, अपना-पराया नहीं है। जब उनका सुखमें राग ही नहीं है, तब उनमें रागजन्य क्रोध तो हो ही कैसे सकता है॥ २२॥