श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.17.23

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 17 · अथ सप्तदशोऽध्यायः

तथापि तच्छक्तिविसर्ग एषां

सुखाय दुःखाय हिताहिताय।

बन्धाय मोक्षाय च मृत्युजन्मनोः

शरीरिणां संसृतयेऽवकल्पते॥ २३

tathāpi tacchaktivisarga eṣāṃ

sukhāya duḥkhāya hitāhitāya|

bandhāya mokṣāya ca mṛtyujanmanoḥ

śarīriṇāṃ saṃsṛtaye'vakalpate|| 23

अर्थ

तथापि उनकी मायाशक्तिके कार्य पाप और पुण्य ही प्राणियोंके सुख-दुःख, हित-अहित, बन्ध-मोक्ष, मृत्यु-जन्म और आवागमनके कारण बनते हैं॥ २३॥

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