श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.17.33

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 17 · अथ सप्तदशोऽध्यायः

न ह्यस्यास्ति प्रियः कश्चिन्‍नाप्रियः स्वः परोऽपि वा।

आत्मत्वात्सर्वभूतानां सर्वभूतप्रियो हरिः॥ ३३

na hyasyāsti priyaḥ kaścinnāpriyaḥ svaḥ paro'pi vā|

ātmatvātsarvabhūtānāṃ sarvabhūtapriyo hariḥ|| 33

अर्थ

भगवान्‌को न कोई प्रिय है और न अप्रिय। उनका न कोई अपना है और न पराया। वे सभी प्राणियोंके आत्मा हैं, इसलिये सभी प्राणियोंके प्रियतम हैं॥ ३३॥✎ 546 547 548

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (3)
  • #546 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् को → भगवान्‌को
  • #547 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #548 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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