प्रिये! यह परम भाग्यवान् चित्रकेतु उन्हींका प्रिय अनुचर, शान्त एवं समदर्शी है और मैं भी भगवान् श्रीहरिका ही प्रिय हूँ॥ ३४॥✎ 546547548
तस्य चायं महाभागश्चित्रकेतुः प्रियोऽनुगः।
सर्वत्र समदृक् शान्तो ह्यहं चैवाच्युतप्रियः॥ ३४
प्रिये! यह परम भाग्यवान् चित्रकेतु उन्हींका प्रिय अनुचर, शान्त एवं समदर्शी है और मैं भी भगवान् श्रीहरिका ही प्रिय हूँ॥ ३४॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 6.17.34 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 790) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/6/17/34/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (3)