॥ श्रीहरिः ॥
तस्मान्न विस्मयः कार्यः पुरुषेषु महात्मसु।
महापुरुषभक्तेषु शान्तेषु समदर्शिषु॥ ३५
tasmānna vismayaḥ kāryaḥ puruṣeṣu mahātmasu|
mahāpuruṣabhakteṣu śānteṣu samadarśiṣu|| 35
अर्थ
इसलिये तुम्हें भगवान्के प्यारे भक्त, शान्त, समदर्शी, महात्मा पुरुषोंके सम्बन्धमें किसी प्रकारका आश्चर्य नहीं करना चाहिये॥ ३५॥✎ 546 547 548
तस्मान्न विस्मयः कार्यः पुरुषेषु महात्मसु।
महापुरुषभक्तेषु शान्तेषु समदर्शिषु॥ ३५
इसलिये तुम्हें भगवान्के प्यारे भक्त, शान्त, समदर्शी, महात्मा पुरुषोंके सम्बन्धमें किसी प्रकारका आश्चर्य नहीं करना चाहिये॥ ३५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 6.17.35 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 790) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/6/17/35/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (3)
- #546 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् को → भगवान्को
- #547 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्की
- #548 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्की