प्रायः साधारण पुरुष भी एकान्तमें ही स्त्रियोंके साथ उठते-बैठते हैं, परन्तु ये इतने बड़े व्रतधारी होकर भी उसे भरी सभामें लिये बैठे हैं॥ ८॥
प्रायशः प्राकृताश्चापि स्त्रियं रहसि बिभ्रति।
अयं महाव्रतधरो बिभर्ति सदसि स्त्रियम्॥ ८
प्रायः साधारण पुरुष भी एकान्तमें ही स्त्रियोंके साथ उठते-बैठते हैं, परन्तु ये इतने बड़े व्रतधारी होकर भी उसे भरी सभामें लिये बैठे हैं॥ ८॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 6.17.8 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 787) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/6/17/8/