श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.18.38

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 18 · अथाष्टादशोऽध्यायः

निशम्य तद्वचो विप्रो विमनाः पर्यतप्यत।

अहो अधर्मः सुमहानद्य मे समुपस्थितः॥ ३८

niśamya tadvaco vipro vimanāḥ paryatapyata|

aho adharmaḥ sumahānadya me samupasthitaḥ|| 38

अर्थ

परीक्षित्! दितिकी बात सुनकर कश्यपजी खिन्‍न होकर पछताने लगे। वे मन-ही-मन कहने लगे—‘हाय! हाय! आज मेरे जीवनमें बहुत बड़े अधर्मका अवसर आ पहुँचा॥ ३८॥

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