॥ श्रीहरिः ॥
निशम्य तद्वचो विप्रो विमनाः पर्यतप्यत।
अहो अधर्मः सुमहानद्य मे समुपस्थितः॥ ३८
niśamya tadvaco vipro vimanāḥ paryatapyata|
aho adharmaḥ sumahānadya me samupasthitaḥ|| 38
अर्थ
परीक्षित्! दितिकी बात सुनकर कश्यपजी खिन्न होकर पछताने लगे। वे मन-ही-मन कहने लगे—‘हाय! हाय! आज मेरे जीवनमें बहुत बड़े अधर्मका अवसर आ पहुँचा॥ ३८॥
निशम्य तद्वचो विप्रो विमनाः पर्यतप्यत।
अहो अधर्मः सुमहानद्य मे समुपस्थितः॥ ३८
परीक्षित्! दितिकी बात सुनकर कश्यपजी खिन्न होकर पछताने लगे। वे मन-ही-मन कहने लगे—‘हाय! हाय! आज मेरे जीवनमें बहुत बड़े अधर्मका अवसर आ पहुँचा॥ ३८॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 6.18.38 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 796) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/6/18/38/