देखो तो सही, अब मैं इन्द्रियोंके विषयोंमें सुख मानने लगा हूँ। स्त्रीरूपिणी मायाने मेरे चित्तको अपने वशमें कर लिया है। हाय! हाय! आज मैं कितनी दीन-हीन अवस्थामें हूँ। अवश्य ही अब मुझे नरकमें गिरना पड़ेगा॥ ३९॥
अहो अद्येन्द्रियारामो योषिन्मय्येह मायया।
गृहीतचेताः कृपणः पतिष्ये नरके ध्रुवम्॥ ३९
देखो तो सही, अब मैं इन्द्रियोंके विषयोंमें सुख मानने लगा हूँ। स्त्रीरूपिणी मायाने मेरे चित्तको अपने वशमें कर लिया है। हाय! हाय! आज मैं कितनी दीन-हीन अवस्थामें हूँ। अवश्य ही अब मुझे नरकमें गिरना पड़ेगा॥ ३९॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 6.18.39 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 796) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/6/18/39/