इस स्त्रीका कोई दोष नहीं है; क्योंकि इसने अपने जन्मजात स्वभावका ही अनुसरण किया है। दोष मेरा है—जो मैं अपनी इन्द्रियोंको अपने वशमें न रख सका, अपने सच्चे स्वार्थ और परमार्थको न समझ सका। मुझ मूढको बार-बार धिक्कार है॥ ४०॥
कोऽतिक्रमोऽनुवर्तन्त्याः स्वभावमिह योषितः।
धिङ् मां बताबुधं स्वार्थे यदहं त्वजितेन्द्रियः॥ ४०
इस स्त्रीका कोई दोष नहीं है; क्योंकि इसने अपने जन्मजात स्वभावका ही अनुसरण किया है। दोष मेरा है—जो मैं अपनी इन्द्रियोंको अपने वशमें न रख सका, अपने सच्चे स्वार्थ और परमार्थको न समझ सका। मुझ मूढको बार-बार धिक्कार है॥ ४०॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 6.18.40 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 796) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/6/18/40/