श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.18.41

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 18 · अथाष्टादशोऽध्यायः

शरत्पद्मोत्सवं वक्‍त्रं वचश्‍च श्रवणामृतम्।

हृदयं क्षुरधाराभं स्त्रीणां को वेद चेष्टितम्॥ ४१

śaratpadmotsavaṃ vaktraṃ vacaśca śravaṇāmṛtam|

hṛdayaṃ kṣuradhārābhaṃ strīṇāṃ ko veda ceṣṭitam|| 41

अर्थ

सच है, स्त्रियोंके चरित्रको कौन जानता है। इनका मुँह तो ऐसा होता है जैसे शरद्ऋतुका खिला हुआ कमल। बातें सुननेमें ऐसी मीठी होती हैं, मानो अमृत घोल रखा हो। परन्तु हृदय, वह तो इतना तीखा होता है कि मानो छुरेकी पैनी धार हो॥ ४१॥

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें