॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 6.18.50
नोच्छिष्टास्पृष्टसलिला सन्ध्यायां मुक्तमूर्धजा।
अनर्चितासंयतवाङ्नासंवीता बहिश्चरेद्॥ ५०
nocchiṣṭāspṛṣṭasalilā sandhyāyāṃ muktamūrdhajā|
anarcitāsaṃyatavāṅnāsaṃvītā bahiścared|| 50
अर्थ
जूठे मुँह, बिना आचमन किये, सन्ध्याके समय, बाल खोले हुए, बिना शृंगारके, वाणीका संयम किये बिना और बिना चद्दर ओढ़े घरसे बाहर न निकले॥ ५०॥