प्रिये! इस व्रतका नाम ‘पुंसवन’ है। यदि एक वर्षतक तुम इसे बिना किसी त्रुटिके पालन कर सकोगी तो तुम्हारी कोखसे इन्द्रघाती पुत्र उत्पन्न होगा॥ ५४॥
सांवत्सरं पुंसवनं व्रतमेतदविप्लुतम्।
धारयिष्यसि चेत्तुभ्यं शक्रहा भविता सुतः॥ ५४
प्रिये! इस व्रतका नाम ‘पुंसवन’ है। यदि एक वर्षतक तुम इसे बिना किसी त्रुटिके पालन कर सकोगी तो तुम्हारी कोखसे इन्द्रघाती पुत्र उत्पन्न होगा॥ ५४॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 6.18.54 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 797) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/6/18/54/