परीक्षित्! दिति बड़ी मनस्विनी और दृढ़ निश्चयवाली थी। उसने ‘बहुत ठीक’ कहकर उनकी आज्ञा स्वीकार कर ली। अब दिति अपनी कोखमें भगवान् कश्यपका वीर्य और जीवनमें उनका बतलाया हुआ व्रत धारण करके अनायास ही नियमोंका पालन करने लगी॥ ५५॥
वाढमित्यभिप्रेत्याथ दिती राजन् महामनाः।
काश्यपं गर्भमाधत्त व्रतं चाञ्जो दधार सा॥ ५५
परीक्षित्! दिति बड़ी मनस्विनी और दृढ़ निश्चयवाली थी। उसने ‘बहुत ठीक’ कहकर उनकी आज्ञा स्वीकार कर ली। अब दिति अपनी कोखमें भगवान् कश्यपका वीर्य और जीवनमें उनका बतलाया हुआ व्रत धारण करके अनायास ही नियमोंका पालन करने लगी॥ ५५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 6.18.55 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 798) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/6/18/55/