चिन्तां तीव्रां गतः शक्रः केन मे स्याच्छिवं त्विह॥ ५९
nādhyagacchadvratacchidraṃ tatparo'tha mahīpate|
cintāṃ tīvrāṃ gataḥ śakraḥ kena me syācchivaṃ tviha|| 59
अर्थ
सर्वदा पैनी दृष्टि रखनेपर भी उन्हें उसके व्रतमें किसी प्रकारकी त्रुटि न मिली और वे पूर्ववत् उसकी सेवा-टहलमें लगे रहे। अब तो इन्द्रको बड़ी चिन्ता हुई। वे सोचने लगे—मैं ऐसा कौन-सा उपाय करूँ, जिससे मेरा कल्याण हो?॥ ५९॥
नाध्यगच्छद्व्रतच्छिद्रं तत्परोऽथ महीपते।
चिन्तां तीव्रां गतः शक्रः केन मे स्याच्छिवं त्विह॥ ५९
सर्वदा पैनी दृष्टि रखनेपर भी उन्हें उसके व्रतमें किसी प्रकारकी त्रुटि न मिली और वे पूर्ववत् उसकी सेवा-टहलमें लगे रहे। अब तो इन्द्रको बड़ी चिन्ता हुई। वे सोचने लगे—मैं ऐसा कौन-सा उपाय करूँ, जिससे मेरा कल्याण हो?॥ ५९॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 6.18.59 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 798) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/6/18/59/