दिति व्रतके नियमोंका पालन करते-करते बहुत दुर्बल हो गयी थी। विधाताने भी उसे मोहमें डाल दिया। इसलिये एक दिन सन्ध्याके समय जूठे मुँह, बिना आचमन किये और बिना पैर धोये ही वह सो गयी॥ ६०॥✎ 552
एकदा सा तु सन्ध्यायामुच्छिष्टा व्रतकर्शिता।
अस्पृष्टवार्यधौताङ्घ्रिः सुष्वाप विधिमोहिता॥ ६०
दिति व्रतके नियमोंका पालन करते-करते बहुत दुर्बल हो गयी थी। विधाताने भी उसे मोहमें डाल दिया। इसलिये एक दिन सन्ध्याके समय जूठे मुँह, बिना आचमन किये और बिना पैर धोये ही वह सो गयी॥ ६०॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 6.18.60 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 798) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/6/18/60/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)