राजन्! जब इन्द्र उनके टुकड़े-टुकड़े करने लगे, तब उन सबोंने हाथ जोड़कर इन्द्रसे कहा—‘देवराज! तुम हमें क्यों मार रहे हो? हम तो तुम्हारे भाई मरुद्गण हैं’॥ ६३॥✎ 553
ते तमूचुः पाट्यमानाः सर्वे प्राञ्जलयो नृप।
नो जिघांससि किमिन्द्र भ्रातरो मरुतस्तव॥ ६३
राजन्! जब इन्द्र उनके टुकड़े-टुकड़े करने लगे, तब उन सबोंने हाथ जोड़कर इन्द्रसे कहा—‘देवराज! तुम हमें क्यों मार रहे हो? हम तो तुम्हारे भाई मरुद्गण हैं’॥ ६३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 6.18.63 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 799) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/6/18/63/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)