श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.18.64

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 18 · अथाष्टादशोऽध्यायः

मा भैष्ट भ्रातरो मह्यं यूयमित्याह कौशिकः।

अनन्यभावान् पार्षदानात्मनो मरुतां गणान्॥ ६४

mā bhaiṣṭa bhrātaro mahyaṃ yūyamityāha kauśikaḥ|

ananyabhāvān pārṣadānātmano marutāṃ gaṇān|| 64

अर्थ

तब इन्द्रने अपने भावी अनन्यप्रेमी पार्षद मरुद्गणसे कहा—‘अच्छी बात है, तुमलोग मेरे भाई हो। अब मत डरो!’॥ ६४॥✎ 553

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #553 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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