तब इन्द्रने अपने भावी अनन्यप्रेमी पार्षद मरुद्गणसे कहा—‘अच्छी बात है, तुमलोग मेरे भाई हो। अब मत डरो!’॥ ६४॥✎ 553
मा भैष्ट भ्रातरो मह्यं यूयमित्याह कौशिकः।
अनन्यभावान् पार्षदानात्मनो मरुतां गणान्॥ ६४
तब इन्द्रने अपने भावी अनन्यप्रेमी पार्षद मरुद्गणसे कहा—‘अच्छी बात है, तुमलोग मेरे भाई हो। अब मत डरो!’॥ ६४॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 6.18.64 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 799) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/6/18/64/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)