प्रभो! आपकी कीर्ति पवित्र है। आप दोनों ही त्रिलोकीके वरदानी परमेश्वर हैं। अतः मेरी बड़ी-बड़ी आशा-अभिलाषाएँ आपकी कृपासे पूर्ण हों’॥ १४॥
यथा युवां त्रिलोकस्य वरदौ परमेष्ठिनौ।
तथा म उत्तमश्लोक सन्तु सत्या महाशिषः॥ १४
प्रभो! आपकी कीर्ति पवित्र है। आप दोनों ही त्रिलोकीके वरदानी परमेश्वर हैं। अतः मेरी बड़ी-बड़ी आशा-अभिलाषाएँ आपकी कृपासे पूर्ण हों’॥ १४॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 6.19.14 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 802) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/6/19/14/