श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.19.18

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 19 · अथैकोनविंशोऽध्यायः

कृतमेकतरेणापि दम्पत्योरुभयोरपि।

पत्न्यां कुर्यादनर्हायां पतिरेतत् समाहितः॥ १८

kṛtamekatareṇāpi dampatyorubhayorapi|

patnyāṃ kuryādanarhāyāṃ patiretat samāhitaḥ|| 18

अर्थ

परीक्षित्! पति-पत्नीमेंसे एक भी कोई काम करता है, तो उसका फल दोनोंको होता है। इसलिये यदि पत्‍नी (रजोधर्म आदिके समय) यह व्रत करनेके अयोग्य हो जाय तो बड़ी एकाग्रता और सावधानीसे पतिको ही इसका अनुष्ठान करना चाहिये॥ १८॥✎ 558 559 560 561 1614

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (5)
  • #558 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् को → भगवान्‌को
  • #559 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #560 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #561 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #1614 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: आत्म-शुद्धि → आत्मशुद्धि

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