श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.19.17

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 19 · अथैकोनविंशोऽध्यायः

पतिं च परया भक्‍त्या महापुरुषचेतसा।

प्रियैस्तैस्तैरुपनमेत् प्रेमशीलः स्वयं पतिः।

बिभृयात् सर्वकर्माणि पत्न्या उच्चावचानि च॥ १७

patiṃ ca parayā bhaktyā mahāpuruṣacetasā|

priyaistaistairupanamet premaśīlaḥ svayaṃ patiḥ|

bibhṛyāt sarvakarmāṇi patnyā uccāvacāni ca|| 17

अर्थ

भगवान्‌की पूजाके बाद अपने पतिको साक्षात् भगवान् समझकर परम प्रेमसे उनकी प्रिय वस्तुएँ सेवामें उपस्थित करे। पतिका भी यह कर्तव्य है कि वह आन्तरिक प्रेमसे अपनी पत्नीके प्रिय पदार्थ ला-लाकर उसे दे और उसके छोटे-बड़े सब प्रकारके काम करता रहे॥ १७॥✎ 558 559 560 561 1614

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (5)
  • #558 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् को → भगवान्‌को
  • #559 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #560 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #561 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #1614 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: आत्म-शुद्धि → आत्मशुद्धि

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