॥ श्रीहरिः ॥
ततः स्तुवीत स्तोत्रेण भक्तिप्रह्वेण चेतसा।
यज्ञोच्छिष्टमवघ्राय पुनरभ्यर्चयेद्धरिम्॥ १६
tataḥ stuvīta stotreṇa bhaktiprahveṇa cetasā|
yajñocchiṣṭamavaghrāya punarabhyarcayeddharim|| 16
अर्थ
तदनन्तर भक्तिभावभरित हृदयसे भगवान्की स्तुति करे और यज्ञावशेषको सूँघकर फिर भगवान्की पूजा करे॥ १६॥✎ 558 559 560 561 1614
ततः स्तुवीत स्तोत्रेण भक्तिप्रह्वेण चेतसा।
यज्ञोच्छिष्टमवघ्राय पुनरभ्यर्चयेद्धरिम्॥ १६
तदनन्तर भक्तिभावभरित हृदयसे भगवान्की स्तुति करे और यज्ञावशेषको सूँघकर फिर भगवान्की पूजा करे॥ १६॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 6.19.16 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 803) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/6/19/16/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (5)
- #558 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् को → भगवान्को
- #559 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्की
- #560 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्की
- #561 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्की
- #1614 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: आत्म-शुद्धि → आत्मशुद्धि