श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.19.16

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 19 · अथैकोनविंशोऽध्यायः

ततः स्तुवीत स्तोत्रेण भक्तिप्रह्वेण चेतसा।

यज्ञोच्छिष्टमवघ्राय पुनरभ्यर्चयेद्धरिम्॥ १६

tataḥ stuvīta stotreṇa bhaktiprahveṇa cetasā|

yajñocchiṣṭamavaghrāya punarabhyarcayeddharim|| 16

अर्थ

तदनन्तर भक्तिभावभरित हृदयसे भगवान्‌की स्तुति करे और यज्ञावशेषको सूँघकर फिर भगवान्‌की पूजा करे॥ १६॥✎ 558 559 560 561 1614

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (5)
  • #558 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् को → भगवान्‌को
  • #559 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #560 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #561 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #1614 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: आत्म-शुद्धि → आत्मशुद्धि

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