श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.19.2

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 19 · अथैकोनविंशोऽध्यायः

श्रीशुक उवाच

शुक्ले मार्गशिरे पक्षे योषिद्भर्तुरनुज्ञया।

आरभेत व्रतमिदं सार्वकामिकमादितः॥ २

śukle mārgaśire pakṣe yoṣidbharturanujñayā|

ārabheta vratamidaṃ sārvakāmikamāditaḥ|| 2

अर्थ

श्रीशुकदेवजीने कहा—परीक्षित्! यह पुंसवन-व्रत समस्त कामनाओंको पूर्ण करनेवाला है। स्त्रीको चाहिये कि वह अपने पतिदेवकी आज्ञा लेकर मार्गशीर्ष शुक्ल प्रतिपदासे इसका आरम्भ करे॥ २॥✎ 556

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #556 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें