इसके बाद भगवान्को उनके धाममें पधरा दे, विसर्जन कर दे। तदनन्तर आत्मशुद्धि और समस्त अभिलाषाओंकी पूर्तिके लिये पहलेसे ही उन्हें निवेदित किया हुआ प्रसाद ग्रहण करे॥ २०॥✎ 5585595605611614
उद्वास्य देवं स्वे धाम्नि तन्निवेदितमग्रतः।
अद्यादात्मविशुद्ध्यर्थं सर्वकामर्द्धये तथा॥ २०
इसके बाद भगवान्को उनके धाममें पधरा दे, विसर्जन कर दे। तदनन्तर आत्मशुद्धि और समस्त अभिलाषाओंकी पूर्तिके लिये पहलेसे ही उन्हें निवेदित किया हुआ प्रसाद ग्रहण करे॥ २०॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 6.19.20 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 803) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/6/19/20/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (5)