पहले आचार्यको भोजन कराये, फिर मौन होकर भाई-बन्धुओंके साथ स्वयं भोजन करे। इसके बाद हवनसे बची हुई घृतमिश्रित खीर अपनी पत्नीको दे। वह प्रसाद स्त्रीको सत्पुत्र और सौभाग्य दान करनेवाला होता है॥ २४॥
आचार्यमग्रतः कृत्वा वाग्यतः सह बन्धुभिः।
दद्यात्पत्न्यै चरोः शेषं सुप्रजस्त्वं सुसौभगम्॥ २४
पहले आचार्यको भोजन कराये, फिर मौन होकर भाई-बन्धुओंके साथ स्वयं भोजन करे। इसके बाद हवनसे बची हुई घृतमिश्रित खीर अपनी पत्नीको दे। वह प्रसाद स्त्रीको सत्पुत्र और सौभाग्य दान करनेवाला होता है॥ २४॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 6.19.24 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 804) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/6/19/24/